Monday, 01 June 2026
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भोपाल: ब्यूरोक्रेसी का 'रियल एस्टेट मास्टरस्ट्रोक'; प्रोजेक्ट से पहले जमीन खरीद पर खड़े हुए सवाल

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भोपाल: मध्य प्रदेश की राजधानी में एक ही दिन में हुई 50 वरिष्ठ नौकरशाहों की 'लैंड डील' ने प्रशासनिक नैतिकता और हितों के टकराव (Conflict of Interest) की बहस को जन्म दे दिया है। 4 अप्रैल 2022 को देश भर के करीब 50 IAS और IPS अधिकारियों ने कोलार क्षेत्र के गुराड़ी घाट में एक ही दिन जमीन की रजिस्ट्री कराई। इम्पॉर्टेंट प्रॉपर्टी रिटर्न्स (IPR) में इस निवेश को 'लाइक-माइंडेड ऑफिसर्स' की साझा संपत्ति बताया गया है। इस सौदे की टाइमिंग और स्थान ने इसलिए भी सबको चौंका दिया है क्योंकि यह भूमि सीधे तौर पर आगामी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से जुड़ी हुई है।

इस निवेश की सबसे विवादित कड़ी ₹3,200 करोड़ का वेस्टर्न बायपास प्रोजेक्ट है। अधिकारियों द्वारा जमीन खरीदने के महज 16 महीने बाद सरकार ने इस विशालकाय प्रोजेक्ट को मंजूरी दी, जिसका अलाइनमेंट इन अधिकारियों की जमीन से महज 500 मीटर की दूरी पर है। यह स्थिति 'इनसाइडर ट्रेडिंग' जैसे संदेह उत्पन्न करती है, जहाँ नीति निर्माताओं को सार्वजनिक योजनाओं की जानकारी पहले से होती है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या बायपास के रूट का चयन इस निजी निवेश को लाभ पहुँचाने के लिए किया गया या यह केवल एक संयोग था।

जमीन की कीमतों में हुआ जादुई उछाल इस मामले को और अधिक संदेहास्पद बनाता है। अप्रैल 2022 में जिस कृषि भूमि को लगभग ₹82 प्रति वर्ग फीट की दर से खरीदा गया था, उसका 'लैंड यूज' जून 2024 में बदलकर आवासीय (Residential) कर दिया गया। वर्तमान में इस जमीन की बाजार कीमत ₹2,500 प्रति वर्ग फीट से भी अधिक आँकी जा रही है। इसका अर्थ है कि महज दो वर्षों में अधिकारियों के निवेश की कीमत ₹5.5 करोड़ से बढ़कर लगभग ₹60 करोड़ के पार पहुँच गई है, जो करीब 1,100% की वृद्धि है।

प्रशासनिक नियमों के तहत सिविल सेवा अधिकारियों को अपनी संपत्ति का विवरण सार्वजनिक करना अनिवार्य है, जिसे इन अधिकारियों ने तकनीकी रूप से निभाया भी है। हालांकि, सामूहिक रूप से एक ही स्थान पर निवेश करना और फिर उसी क्षेत्र में सरकारी नीतियों का अनुकूल होना नैतिकता के मानकों पर खरा नहीं उतरता। विशेषज्ञों का मानना है कि जब लोक सेवक ऐसे क्षेत्रों में निवेश करते हैं जहाँ वे स्वयं निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं, तो यह सीधे तौर पर पद के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार की श्रेणी में आ सकता है।

वर्तमान में यह मामला सार्वजनिक डोमेन में आने के बाद प्रशासनिक पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रहा है। जहाँ एक ओर आम नागरिक बुनियादी सुविधाओं के लिए वर्षों संघर्ष करता है, वहीं दूसरी ओर सूचनाओं के केंद्र में बैठे अधिकारियों का यह 'वेल्थ क्रिएशन मॉडल' व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करता है। इस मामले में स्वतंत्र जांच की मांग उठ रही है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि क्या विकास की योजनाओं का खाका निजी लाभ को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था।

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