जबलपुर/इंदौर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया है। न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई की एकलपीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अनुकंपा नियुक्ति कोई वंशागत संपत्ति या विरासत में मिलने वाला अधिकार नहीं है, बल्कि यह संकटग्रस्त परिवार को अचानक आई आर्थिक तंगी से बचाने के लिए दी जाने वाली एक 'रियायत' है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में मृतक के बेटे को विवाहित बेटी की तुलना में प्राथमिकता दी जाएगी।
विवाहित बेटी और बेटे के दावों के बीच फंसा था मामला
यह विवाद रतलाम जिला अस्पताल में पदस्थ ड्राइवर रमेशवान गोस्वामी के निधन के बाद शुरू हुआ, जिनकी 22 जून 2020 को सेवाकाल के दौरान मृत्यु हो गई थी। इसके बाद उनके बेटे रितेश वान ने दिसंबर 2021 में अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। हालांकि, उनकी विवाहित बहन अनीता वान ने भी उसी पद पर अपना दावा पेश कर दिया, जिससे विभाग ने असमंजस में पड़कर दोनों से 'सक्सेशन सर्टिफिकेट' (Succession Certificate) की मांग की थी।
हाईकोर्ट की टिप्पणी: अनुकंपा नियुक्ति के लिए 'सक्सेशन सर्टिफिकेट' की जरूरत नहीं
अदालत ने विभाग द्वारा उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (Succession Certificate) मांगने की शर्त को पूरी तरह से गलत और मनमाना करार दिया। हाईकोर्ट ने कहा:
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सक्सेशन सर्टिफिकेट का आधार: यह केवल बैंक खाते, शेयर या चल संपत्ति जैसी वित्तीय संपत्तियों के हस्तांतरण के लिए आवश्यक है।
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कानूनी स्थिति: अनुकंपा नियुक्ति एक राहतकारी नीति है, जिसमें सही वारिस तय करने के लिए उत्तराधिकार प्रमाण पत्र पर जोर देना बिना किसी कानूनी अधिकार के है।
2014 की नीति बनाम 2023 का संशोधन
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि चूंकि कर्मचारी की मृत्यु 2020 में हुई थी, इसलिए उस समय प्रभावी 'अनुकंपा नियुक्ति नीति 2014' ही इस मामले पर लागू होगी। यद्यपि 2023 के नीतिगत संशोधन में विवाहित और अविवाहित बेटियों के बीच भेदभाव खत्म कर दिया गया है, लेकिन यह संशोधन पुराने मामलों (बैकडेट) पर लागू नहीं होता। 2014 की नीति के अनुसार प्राथमिकता क्रम में पुत्र का स्थान विवाहित पुत्री से पहले आता है।
शर्त के साथ नियुक्ति: आश्रितों का भरण-पोषण अनिवार्य
अदालत ने निर्देश दिया कि अनुकंपा नियुक्ति से पहले बेटे रितेश वान को एक हलफनामा (Affidavit) देना होगा। इस हलफनामे में यह वचन देना अनिवार्य है कि वह अपनी मां और परिवार के अन्य आश्रितों का उचित भरण-पोषण करेंगे। यदि वे भविष्य में ऐसा करने में विफल रहते हैं, तो उनकी नियुक्ति रद्द की जा सकती है। इसी के साथ कोर्ट ने विवाहित बेटी की याचिका को खारिज करते हुए बेटे के दावे को कानूनी रूप से मजबूत बताया।
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