Monday, 21 September 2026
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सत्या निकेतन में भरभराकर गिरी इमारत, 7 की मौत: मलबे के बीच अपनों को तलाशते रहे छात्र, अस्पताल में खून देने उमड़ी भीड़

नई दिल्ली। सोमवार की सुबह दिल्ली के सत्या निकेतन की गलियां फिर से सामान्य होती दिखाई दे रही थीं। दुकानें खुल चुकी थीं, छात्र नाश्ते और जरूरी सामान के लिए बाहर निकल रहे थे और पीजी में रहने वाले युवाओं की आवाजाही शुरू हो गई थी। लेकिन कुछ ही गलियां आगे का मंजर इस सामान्य सुबह से बिल्कुल अलग था।

रविवार को भरभराकर गिरी इमारत के आसपास मलबा, धूल और मुड़ी हुई लोहे की सरियों का ढेर था। सड़कें बैरिकेड से बंद थीं और राहत-बचाव दल मलबे के बीच जिंदगी तलाश रहा था। इस हादसे में 7 लोगों की मौत हुई, जबकि 5 लोग घायल हुए हैं।

लंबी छुट्टी ने टाली बड़ी तबाही?

सत्या निकेतन की ये गलियां दिल्ली विश्वविद्यालय के आसपास पढ़ने वाले छात्रों से अक्सर भरी रहती हैं। यहां बड़ी संख्या में छात्र पीजी और किराये के कमरों में रहते हैं।

एक स्थानीय निवासी के मुताबिक, हादसा जिस समय हुआ उस दौरान लंबी छुट्टी के कारण कई छात्र अपने घर लौट चुके थे। स्थानीय लोगों का कहना था कि अगर छात्र बड़ी संख्या में इलाके में मौजूद होते तो हादसे में मरने वालों की संख्या और ज्यादा हो सकती थी।

रातभर चलता रहा रेस्क्यू ऑपरेशन

हादसे के बाद दिल्ली पुलिस, दमकल विभाग, राष्ट्रीय आपदा मोचन बल यानी NDRF और अन्य एजेंसियों ने रातभर राहत एवं बचाव अभियान चलाया।

सोमवार सुबह करीब 10 बजे तक मलबे का बड़ा हिस्सा हटाया जा चुका था। पुलिस और नगर निगम के अधिकारियों को आशंका थी कि अब मलबे के नीचे कोई और व्यक्ति नहीं होगा। हालांकि बेसमेंट की तलाशी अभी जारी थी।

लेकिन कुछ स्थानीय लोग इस बात को मानने को तैयार नहीं थे।

उन्हें अब भी लग रहा था कि शायद कोई व्यक्ति मलबे के नीचे फंसा हो।

करीब 11 बजे रेस्क्यू टीम के K9 यूनिट के एक कुत्ते ने मलबे के पास भौंकना शुरू किया। इसके करीब एक घंटे बाद बचावकर्मियों ने मलबे से एक और व्यक्ति को बाहर निकाला और तुरंत अस्पताल पहुंचाया।

यह बचाव अभियान का आखिरी रेस्क्यू साबित हुआ।

बैरिकेड के बाहर खड़े छात्र, मोबाइल में तलाशते रहे अपनों के नाम

हादसे के बाद सत्या निकेतन में सिर्फ राहत-बचाव दल ही नहीं था। बड़ी संख्या में छात्र भी घटनास्थल के बाहर जमा थे।

कुछ छात्र रातभर वहीं मौजूद रहे तो कुछ सोमवार सुबह पहुंचे। इनमें कई ऐसे थे जो उसी कॉलेज में पढ़ते थे, जहां हादसे में घायल या मृत हुए छात्र पढ़ते थे।

हाथों में मोबाइल लिए छात्र लगातार WhatsApp ग्रुप और सोशल मीडिया पर अपडेट देख रहे थे।

किसी लापता छात्र का नाम सामने आता तो उसकी तस्वीर और जानकारी अलग-अलग ग्रुपों में शेयर होने लगती। फिर किसी के अस्पताल में मिलने की खबर आती और कुछ देर बाद पता चलता कि वह जानकारी गलत थी।

ऐसे में छात्रों के लिए हर फोन नोटिफिकेशन डर और उम्मीद दोनों लेकर आ रहा था।

रेस्क्यू टीम के लिए छात्र बने सहारा

मलबे के बाहर खड़े छात्र केवल अपने दोस्तों की खबर का इंतजार नहीं कर रहे थे।

बचाव अभियान में जुटे अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए छात्रों ने खाने-पीने का इंतजाम भी किया। गर्मी में घंटों मौके पर खड़े पत्रकारों और राहतकर्मियों को भी छात्रों ने पानी और पेय पदार्थ उपलब्ध कराए।

सत्या निकेतन की संकरी गलियों ने रेस्क्यू ऑपरेशन को और मुश्किल बना दिया था। जब भी बुलडोजर या मलबा हटाने वाला डंपर बाहर निकलता, पुलिस को भीड़ हटाकर उसके लिए रास्ता बनाना पड़ता था।

AIIMS में भी जुटे छात्र, घायल साथी के लिए मांगा खून

एक तरफ सत्या निकेतन में मलबा हटाया जा रहा था तो दूसरी तरफ AIIMS में छात्रों की भीड़ जुट रही थी।

यहां छात्र किसी तमाशबीन की तरह नहीं, बल्कि अपने घायल साथियों की मदद करने पहुंचे थे।

19 वर्षीय नीरज बावा, जो जम्मू-कश्मीर के कठुआ के रहने वाले थे और मोतीलाल नेहरू कॉलेज में पढ़ते थे, हादसे में घायल हुए थे। शुरुआत में उनकी चोटें मामूली बताई गईं, लेकिन रात में उनकी हालत बिगड़ गई।

परिजनों के मुताबिक डॉक्टरों ने बताया कि नीरज के शरीर में अंदरूनी रक्तस्राव हो रहा था और उन्हें करीब छह बोतल खून की जरूरत थी।

सोशल मीडिया पर रक्तदाताओं की अपील शुरू हुई।

इसके बाद करीब 20 से 25 छात्र AIIMS पहुंच गए।

इनमें से कुछ नीरज को जानते थे, जबकि कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने उन्हें पहले कभी देखा तक नहीं था।

फिर भी वे अस्पताल पहुंचे।

नीरज ICU में भर्ती रहे।

17 साल के पवन को ढूंढते रहे दोस्त

हादसे के बाद 17 वर्षीय पवन कुमार, जो उत्तर प्रदेश के औरैया के रहने वाले थे, को उनके दोस्त तलाशते रहे।

पवन के परिवार को दिल्ली पहुंचने में समय लग रहा था। ऐसे में उनके दोस्त ही पुलिस और अस्पतालों के बीच जानकारी जुटा रहे थे।

बाद में पवन की मौत की पुष्टि हुई।

मां रातभर बेटे को तलाशती रही, दोपहर में मिला शव

हादसे में मध्य प्रदेश के रहने वाले 19 वर्षीय अर्पित जाज की भी मौत हो गई।

हादसे की खबर मिलने के बाद उनकी मां मध्य प्रदेश से दिल्ली पहुंचीं। बेटे की तलाश में वह रातभर पुलिस थानों और अस्पतालों के चक्कर लगाती रहीं।

लेकिन अर्पित का कोई पता नहीं चला।

दोपहर करीब 3 बजे परिवार के एक सदस्य ने शवगृह में अर्पित के शव की पहचान की।

परिवार के मुताबिक अर्पित रक्षाबंधन के लिए घर आए थे और शनिवार को ही वापस दिल्ली लौटे थे।

घर लौटे अभी कुछ ही घंटे हुए थे।

लेकिन अब वह दोबारा घर नहीं लौट पाएंगे।

हादसे में जान गंवाने वाले पांच छात्र

इस हादसे में जान गंवाने वालों में पांच छात्र शामिल हैं।

  • अर्पित जाज, 19 वर्ष, मध्य प्रदेश

  • अभिषेक, 20 वर्ष, सोनभद्र, उत्तर प्रदेश

  • युवराज सोनी, 20 वर्ष, दुर्ग, छत्तीसगढ़

  • पवन कुमार, 17 वर्ष, औरैया, उत्तर प्रदेश

  • अक्षत सिंह यादव, 18 वर्ष, मध्य प्रदेश

अक्षत दिल्ली विश्वविद्यालय में B.Com Honours की पढ़ाई कर रहे थे।

इनके अलावा 75 वर्षीय मजदूर सुरिंदर सिंह और एक अज्ञात व्यक्ति की भी मौत हुई है।

हादसे में घायल पांच लोगों का इलाज चल रहा है। इनमें से तीन की हालत गंभीर बताई गई है।

बिल्डिंग के मालिक समेत तीन गिरफ्तार

अधिकारियों के मुताबिक इमारत के मालिक हरिराम बंसल, उनकी पत्नी उर्मिला और बेटे महेश बंसल को गिरफ्तार किया गया है।

जांच एजेंसियां इमारत गिरने की वजह का पता लगाने में जुटी हैं।

अधिकारियों के अनुसार यह इमारत वर्ष 1990 में बनी थी। हाल ही में इसके बेसमेंट में मरम्मत का काम किए जाने की जानकारी सामने आई है। इमारत के गिरने की संभावित वजहों में जलभराव को भी जांच के दायरे में रखा गया है।

रेस्क्यू ऑपरेशन पूरा होने के बाद आसपास की इमारतों की भी जांच किए जाने की बात कही गई है।

लेकिन सत्या निकेतन में सवाल अभी बाकी हैं...

सोमवार को मलबा हटता गया, लेकिन वहां खड़े छात्रों के सवाल खत्म नहीं हुए।

किसी को अपने दोस्त का इंतजार था।

किसी परिवार को अस्पताल से आने वाली खबर का।

किसी छात्र को डर था कि WhatsApp पर दिखाई देने वाला अगला नाम कहीं उसके किसी परिचित का न हो।

सत्या निकेतन की उन संकरी गलियों में सोमवार को जिंदगी धीरे-धीरे लौट रही थी।

लेकिन जिन परिवारों ने अपने बच्चों को खो दिया, उनके लिए यह शहर, यह सड़क और यह हादसा अब कभी पहले जैसा नहीं रहेगा।

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