Sunday, 20 September 2026
Swaraj Express
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मध्य प्रदेश

चंबल वाइल्डलाइफ सेंक्चुअरी से गुजरेगी अडानी प्रोजेक्ट की डीसी लाइन, प्रदेश सरकार ने दी सहमति


SP Tripathi:
मध्यप्रदेश में हुकूमत भाजपा की या अडाणी की? यह सवाल इसलिए उठना लाजिमी है, क्योंकि मध्यप्रदेश में अडाणी के इशारे पर क्या नियम, क्या कायदे और क्या वन कानून—सब कुछ धराशायी होता दिखाई दे रहा है... ताजा मामला अडाणी एनर्जी सल्यूशन लिमिटेड (Adani Energy Solutions Limited) के एक ऐसे प्रोजेक्ट से सामने आ रहा है, जहां क्या वन्यजीव (Wildlife) और क्या वन क्षेत्र (Forest Area)—सभी की क्लियरेन्स एक झटके में पूरी हो गई... और तो और, मंत्रालय से हुई कार्यवाही देखकर तो “चट मंगनी, पट ब्याह” वाली कहावत भी मानो अपने मायने तलाशती नजर आ रही है... लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या है इस प्रोजेक्ट में कि नियमों की कठोरता भी इसके सामने नरम पड़ती दिखाई दे रही है?... स्वराज एक्सप्रेस यह दावा ऐसे ही हवा में नहीं कर रहा... दरअसल, राजस्थान सरकार और यूपी सरकार के बीच 6000 मेगावाट रिन्यूवल एनर्जी सप्लाई करने का एक करार हुआ है, जिसके तहत राजस्थान सरकार उत्तरप्रदेश सरकार को बिजली की आपूर्ति करेगा... इस करार  को पूरा करने के लिए अडाणी एनर्जी सल्यूशेन लिमिटेड (Adani Energy Solutions Limited) को कन्ट्रेक्ट मिला... यह बात अपनी जगह है... लेकिन असली कहानी तो यहां से शुरू होती है... और यहीं से सामने आता है अडाणी पावर, यानी मध्यप्रदेश सरकार की हुकूमत में अडाणी के हुकूक का खेल... तो जानिये कैसे?... बिजली का उत्पादन राजस्थान के भड़ला नामक स्थान पर होगा और बिजली का सप्लाई स्टेशन उत्तरप्रदेश के फतेहपुर में है... दोनों के बीच की दूरी करीब 890 किलोमीटर है... लिहाजा इस दूरी के बीच 800 केह्वी की एच.बी.डी.सी. लाइन (800 KV HVDC Line) डाली जानी है... यानी हाई बोल्ड डी.सी. लाइन (High Voltage DC Line)... यह लाइन राजस्थान से होकर मध्यप्रदेश के रास्ते फतेहपुर जा रही है... जबकि सवाल यह है कि यह लाइन सीधे राजस्थान से उत्तरप्रदेश के रास्ते भी जा सकती थी... फिर मध्यप्रदेश का रास्ता क्यों?... वजह यह बताई जा रही है कि उत्तरप्रदेश में कम से कम जमीन अधिग्रहीत करनी पड़े... क्योंकि यदि भड़ला राजस्थान से फतेहपुर उत्तरप्रदेश  लाइन सीधे डाली जाती तो लगभग 350 किलोमीटर उत्तरप्रदेश का हिस्सा फंसता... लेकिन जब यही लाइन मध्यप्रदेश के रास्ते डाली जा रही है तो महज 163 किलोमीटर में ही उत्तरप्रदेश का हिस्सा फंस रहा है... यानी जमीन का खेल समझिये... सूत्रों के अनुसार, यदि यह लाइन उत्तरप्रदेश के रास्ते जाती तो अधिग्रहीत होने वाली जमीन के मुआवजे की राशि कई सौ करोड़ रुपये बढ़ जाती... इतना ही नहीं, सर्वे के मुताबिक उत्तरप्रदेश के रास्ते में ज्यादा जमीन प्राइवेट लैन्ड (Private Land) फंस रही थी... ऐसे में मध्यप्रदेश के रास्ते को चिन्हित किया गया... और यह रास्ता अडाणी पावर प्रोजेक्ट के लिए सुगम लगा... लेकिन अडाणी प्रोजेक्ट के लिए सुगम समझा गया यह रास्ता मध्यप्रदेश के लिए कितना दुर्गम साबित होगा, शायद इसकी चिंता किसी को नहीं है... क्योंकि इसी रास्ते पर राष्ट्रीय चम्बल अभयारण्य (National Chambal Sanctuary) यानी वाइल्ड लाइफ सेन्चुरी (Wildlife Sanctuary) के साथ करीब 80 हैक्टेयर वनभूमि (Forest Land) प्रभावित हो रही है... और वनभूमि भी ऐसी जगह की, जो नियमों के मुताबिक किसी भी हालत में प्रभावित नहीं की जा सकती... वह भी राष्ट्रीय वन्यजीव अभयारण्य (National Wildlife Sanctuary) में...आपको बता दे यह वह चम्बल अभयारन्य है जो देश मे एक मात्र घड़ियाल संरक्षित सेन्चुरी है... अब यहां नियमों को समझना भी जरूरी है... राष्ट्रीय अभयारण्य की जमीन को प्रभावित करने के लिए केन्द्र के द्वारा गठित हाई पावर कमेटी (High Power Committee) की अनुमति लेनी पड़ती है... और इस कमेटी का चेयर पर्सन खुद प्रधानमंत्री होता है... लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती... केन्द्रीय स्तर वाली यह कमेटी भी तब तक अनुमोदन नहीं कर सकती, जब तक जिस प्रदेश में वह नेशनल सेन्चुरी है, उस प्रदेश में गठित कमेटी उसे अनुमोदित न करे... और प्रदेश स्तर वाली इस कमेटी का चेयरमैन भी खुद मुख्यमंत्री होता है... यानी नियमों की चौखट इतनी ऊंची है कि नेशनल सेन्चुरी की एक इंच जमीन भी सम्बन्धित राज्य के मुख्यमंत्री और फिर प्रधानमंत्री की अनुमति के बिना प्रभावित नहीं की जा सकती... लेकिन यहां तो मामला कुछ और ही दिखाई दे रहा है... क्योंकि सीधे-सीधे नेशनल चम्बल सेन्चुरी (National Chambal Sanctuary) के साथ वनभूमि की करीब 80 हैक्टेयर भूमि अडाणी जी की सेवा में दी जा रही है, वह भी सेन्चुरी के बीचोंबीच..अडाणी पावर स्टेशन की यह हाई वोल्टेज डी.सी लाइन मध्यप्रदेश मे चम्बल के बनवारा राहू गांव के पास से अन्दर आयेगी और लहार से उत्तरप्रदेश मे प्रवेश करेगी... बहरहाल, प्रदेश सरकार ने पिछले महीने यानी अगस्त में ही इसे अनुमोदित कर केन्द्र को भेज दिया है... और इस अनुमति में वाइल्ड लाइफ के वरिष्ठतम  से लेकर वन विभाग के प्रमुख सचिव और विभाग के तमाम सम्बन्धित अधिकारियो के साथ  प्रशासन के मुखिया यानी बड़े साहब की भी सहमति है... अब जरा सोचिये... वन विभाग के नियम कितने कठोर हैं... नियमों की कठोरता का आलम यह है कि वनक्षेत्र तो छोड़िये, वनक्षेत्र की सीमा यानी मुड़ेर से लगे भू-भाग को भी किसी भी हालत में प्रभावित नहीं किया जा सकता... भले ही प्रदेश के बड़े से बड़े विकास का मार्ग क्यों न रुक जाये... लेकिन यहां मामला अडाणी प्रोजेक्ट (Adani Project) का है... तो नियमों की यह दीवार आखिर इतनी आसानी से कैसे पार हो गई?... और सबसे काबिले गौर बात तो यह है कि इस पूरे प्रोजेक्ट में मध्यप्रदेश को दमड़ी भर का भी कोई फायदा नहीं है... बिजली बेच रहा है राजस्थान, बिजली खरीद रहा है उत्तरप्रदेश... और हर्जाना दे रहा है मध्यप्रदेश... वनक्षेत्र के अलावा राजस्व की भी सैकड़ों हैक्टेयर जमीन जा रही है... एक आकलन के अनुसार प्रदेश की कुल 1250 हैक्टेयर जमीन अडाणी जी का यह पावर प्रोजेक्ट प्रभावित करेगा... जिसकी मध्यप्रदेश में कुल लम्बाई 176.68 किलोमीटर है... यानी जमीन मध्यप्रदेश की... वनभूमि मध्यप्रदेश की... नुकसान मध्यप्रदेश का... और फायदा?... प्रदेश को मिलेगा क्या?... ढेंगा!... खैर, प्रदेश में अगर अडाणी का हुकूक है तो कुछ भी सम्भव है... नियम अपनी जगह... कानून अपनी जगह... वन संरक्षण अपनी जगह... वन्यजीव संरक्षण अपनी जगह... लेकिन अगर रास्ता अडाणी प्रोजेक्ट का हो तो शायद रास्ते के सारे कांटे खुद-ब-खुद हट जाते हैं... ऐसे में “अमर अकबर एन्थनी” फिल्म का वह गाना याद आता है—“अनहोनी को होनी कर दे... होनी को अनहोनी... अमर अकबर एन्थोनी...”... इस फिल्म में तीन पात्रों को फिल्माया गया है... और यहां भी तीन पात्र हैं... वो कौन हैं?...  इसका आकलन आप खुद कर लीजिये...

 

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Comments (1)
AS
Anil shukla
08 Sep 2026

Very 👍