मध्यप्रदेश के गुना जिले के कलेक्ट्रेट परिसर में मंगलवार को उस वक्त असामान्य स्थिति बन गई, जब एक अर्धनग्न युवक हाथ में फटा हुआ आवेदन लिए जोर-जोर से न्याय की गुहार लगाने लगा। युवक की हालत बदहवास थी और उसकी आवाज में गुस्से से ज्यादा बेबसी झलक रही थी। इस दृश्य को देखकर मौके पर मौजूद लोग कुछ देर के लिए ठहर गए और पूरा माहौल तनावपूर्ण हो गया।
युवक की पहचान और दर्दभरी कहानी
इस युवक की पहचान गुना तहसील के ग्राम बरखेड़ागिर्द निवासी खेरू आदिवासी के रूप में हुई है। खेरू का दावा है कि उसने पिछले तीन वर्षों में मजदूरी कर करीब 5 लाख रुपये जोड़े थे, जो उसके भांजे की शादी के लिए रखे गए थे।
खेरू के मुताबिक, टोल टैक्स के पास कुछ अज्ञात लोगों ने उसे रोककर पैसे लूट लिए। उसने आरोप लगाया कि बदमाशों ने उसके साथ मारपीट की और उसके कपड़े तक फाड़ दिए। यह घटना उसके लिए केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि आत्मसम्मान पर गहरी चोट के रूप में सामने आई।
थाने में नहीं हुई सुनवाई का आरोप
पीड़ित का कहना है कि घटना के बाद वह संबंधित थाने पहुंचा, लेकिन वहां उसकी शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया गया। खेरू ने आरोप लगाया कि उसका आवेदन फाड़ दिया गया और उसे थाने से भगा दिया गया।
न्याय की आस टूटने के बाद वह सीधे कलेक्ट्रेट पहुंचा, जहां उसने अपनी बात रखने की कोशिश की।
कलेक्ट्रेट गेट पर रोका गया, बढ़ा हंगामा
जब खेरू कलेक्ट्रेट परिसर के अंदर जाने लगा, तो सुरक्षा में तैनात महिला गार्ड और अन्य कर्मियों ने उसे रोक दिया। इसके बाद उसने गेट के बाहर ही विरोध शुरू कर दिया।
देखते ही देखते वहां भीड़ जमा हो गई और माहौल तनावपूर्ण हो गया। युवक कभी रोता, तो कभी गुस्से में अपनी आपबीती सुनाता रहा।
प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया दूसरा पहलू
घटना के दौरान मौजूद कुछ लोगों और सुरक्षाकर्मियों का कहना है कि युवक नशे की हालत में लग रहा था और उसकी मानसिक स्थिति भी सामान्य नहीं दिख रही थी। हालांकि, इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, क्योंकि न तो मेडिकल जांच हुई और न ही प्रशासन की ओर से स्पष्ट बयान जारी किया गया।
प्रशासन ने संभाली स्थिति, लेकिन उठे कई सवाल
कलेक्ट्रेट में मौजूद अधिकारियों ने किसी तरह स्थिति को नियंत्रित किया और युवक को शांत कराने की कोशिश की। कुछ समय बाद वह वहां से चला गया।
लेकिन यह घटना कई सवाल छोड़ गई—क्या वास्तव में उसके साथ लूट हुई? अगर हुई, तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और अगर नहीं हुई, तो उसका यह विरोध किस दर्द की अभिव्यक्ति है?
सिस्टम पर उठे सवाल
यह पूरा घटनाक्रम केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की तस्वीर भी पेश करता है, जहां आम आदमी की आवाज कई बार अनसुनी रह जाती है।
सच क्या है, यह जांच के बाद ही सामने आएगा, लेकिन खेरू आदिवासी की वह तस्वीर—फटा आवेदन, अर्धनग्न शरीर और न्याय की गुहार—प्रशासनिक तंत्र पर गंभीर सवाल जरूर खड़े कर रही है।
Comments
Leave a Reply