गुना जिले का शिक्षा विभाग एक बार फिर गंभीर आरोपों और प्रशासनिक शिथिलता के घेरे में है। विकासखंड बमोरी में पदस्थ बीआरसीसी कोक सिंह पोरासिया के खिलाफ तत्कालीन कलेक्टर द्वारा भेजा गया निलंबन प्रस्ताव रहस्यमयी ढंग से ठंडे बस्ते में चला गया है। यह मामला न केवल एक अधिकारी की हठधर्मिता को दर्शाता है, बल्कि जिला प्रशासन और लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) के बीच समन्वय और पारदर्शिता पर भी बड़े सवाल खड़े करता है।
क्या था पूरा मामला? (मूल्यांकन कांड 2024)
मामले की जड़ें वर्ष 2024 की कक्षा 5वीं और 8वीं की बोर्ड परीक्षाओं से जुड़ी हैं। नियमों के मुताबिक, मूल्यांकन कार्य शिवानी पब्लिक स्कूल (वनेह) में होना तय था। लेकिन बीआरसीसी कोक सिंह पोरासिया ने सरकारी प्रोटोकॉल को ताक पर रखकर मूल्यांकन कार्य अपने निजी आवास पर शुरू करवा दिया।
कलेक्ट्रेट की औचक जांच में इसका भंडाफोड़ हुआ और कई शिक्षक बीआरसीसी के घर पर कॉपियां जांचते रंगे हाथों पकड़े गए। तत्कालीन कलेक्टर ने इस गंभीर लापरवाही और नियम विरुद्ध कार्य पर सख्त रुख अपनाते हुए बीआरसीसी के निलंबन का प्रस्ताव आयुक्त, लोक शिक्षण संचालनालय, भोपाल को भेजा था।
2 साल बीते: न फाइल मिली, न हुई कोई कार्रवाई"
हैरानी की बात यह है कि कलेक्टर स्तर से भेजे गए प्रस्ताव पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। जिले के गलियारों में अब यह चर्चा आम है कि:
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क्या वह पत्र भोपाल पहुँचा ही नहीं या रास्ते में ही दबा दिया गया?
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क्या शिक्षा विभाग के किसी वरिष्ठ अधिकारी ने पोरासिया को अभयदान दे रखा है?
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क्या अब कलेक्टर के आदेशों की विभाग में कोई अहमियत नहीं रह गई है?
नया खुलासा: मौखिक आदेशों और अवैध वित्तीय अधिकारों का खेल
बीआरसीसी बमोरी पर अब एक और गंभीर आरोप लगा है। सूत्रों के मुताबिक, विकासखंड में विभागीय व्यवस्था लिखित आदेशों के बजाय मौखिक निर्देशों पर चलाई जा रही है।
1. अवैध पदस्थापना: कई जनशिक्षकों को उनके मूल कार्यक्षेत्र से हटाकर बीआरसीसी कार्यालय में अलग-अलग कार्यों में लगा दिया गया है, जिसका कोई वैधानिक लिखित आधार नहीं है। 2. वित्तीय शक्तियों का दुरुपयोग: सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि बिना किसी सक्षम वरिष्ठ कार्यालय की स्वीकृति के, कुछ चहेते जनशिक्षकों को वित्तीय अधिकार सौंप दिए गए हैं। बिना लिखित आदेश के सरकारी धन का आहरण और प्रबंधन करना सीधे तौर पर प्रशासनिक भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है।
प्रशासनिक साख पर सवाल
यदि जिले के मुखिया (कलेक्टर) का प्रस्ताव ही सिस्टम में गायब हो जाता है, तो यह आम जनता की शिकायतों के प्रति विभाग की संवेदनशीलता को दर्शाता है। बमोरी विकासखंड में चल रही यह 'समांतर व्यवस्था' शिक्षा विभाग की पारदर्शिता और अनुशासन की खुली अवहेलना है।
सवाल अब भी बरकरार है: आखिर कब तक जिम्मेदार अधिकारी मौन रहेंगे? क्या शासन इस 'प्रशासनिक जादूगरी' की जांच कराएगा कि निलंबन की फाइल आखिर गई कहाँ? और कब होगी बीआरसीसी बमोरी पर वास्तविक दंडात्मक कार्रवाई?
रिपोर्ट: मनोहर प्रजापति, गुना
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