KPS Rana PWD Controversy:तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के बालकांड की यह चौपाई आज के सामाजिक ताने-बाने में सौ टका फिट बैठती है। चौपाई है — समरथ को नहिं दोष गोसाईं, रवि पावक सुरसरि की नाईं। अर्थात समर्थवान लोगों का कोई दोष नहीं होता, भले ही वे कितने भी विवादों में घिरे हों।
कुछ ऐसा ही ताज़ा उदाहरण है प्रदेश के लोक निर्माण विभाग के प्रमुख अभियंता के.पी.एस. राणा का। जनाब विभाग में अपने चहेतों को नियम विरुद्ध ठेका दिलवाने के नाम से चर्चा में तो हैं ही, साथ ही अब वे इस बात को लेकर विवादों में हैं कि वे मध्यप्रदेश के निवासी हैं भी या नहीं। जिसकी शिकायत मंत्री से लेकर मंत्रालय में विराजमान आला अफसरों तक की जा चुकी है, मगर न तो कोई कार्रवाई हुई और न ही जांच, क्योंकि राणा साहब सड़क निर्माण विभाग के सबसे ऊँचे ओहदे पर बैठे हैं।
तो अब राणा साहब के सेवाकाल के सफर के बारे में जानिए। जब 1992 में पीडब्ल्यूडी में सहायक यंत्री के रूप में विभाग में ज्वाइनिंग दी, तब उन्होंने अपना बर्थ सर्टिफिकेट टीकमगढ़ जिले के पेतपुरा गांव का दिया। साहब की सतपुड़ा भवन में ज्वाइनिंग भी हो गई। उसके बाद वे टीकमगढ़ जिले के ही जतारा में एसडीओ के पद पर पदस्थ हो गए और उनकी नौकरी चलती रही।
लेकिन मूल निवास प्रमाणपत्र पर प्रश्नचिह्न तब लगने लगे जब वे प्रमुख अभियंता के पद पर विराजमान हुए। जिसकी शिकायत भी प्रमुख सचिव कार्यालय को की गई, पर समर्थवान हो चुके राणा जी के लिए वह शिकायत कोई मायने नहीं रखती थी।
ऐसे में जब स्वराज एक्सप्रेस ने उनकी शिकायत पर छानबीन की, तो कई सवाल उठ खड़े हुए। दरअसल राणा साहब का पैत्रिक निवास मऊरानीपुर के गंज मोहल्ला में है, जिसे रानीपुर भी कहा जाता है। पिता का नाम हीरालाल भड़सइयां है, जो बाद में मऊरानीपुर से ग्वालियर आ गए और एक कपड़ा मिल में काम करने लगे। और यहीं से केपीएस राणा ने स्कूली शिक्षा के बाद इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी की।
यह रहा उनके द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले प्रमाणपत्र का खाका।
अब आते हैं उनके पीडब्ल्यूडी विभाग में सहायक यंत्री पद पर ज्वाइन करने की गाथा पर। तो साहब एससी वर्ग का होने का सर्टिफिकेट लगाकर सरकारी सेवा में पात्र हुए। साहब ने प्रमाणपत्र में अपने आपको कोली समाज से होना बताया। सच भी है, कोली समाज मध्यप्रदेश में भी और उत्तरप्रदेश में भी अनुसूचित वर्ग में आता है।
लेकिन संविधान में उल्लेखित आरक्षण नियम 1950 यह भी कहता है कि जिस व्यक्ति को आरक्षण का लाभ मिलेगा, उसे उसके मूल निवास के प्रदेश में ही मिलेगा। अगर वह दूसरे प्रदेश का मूल निवासी है, तो उसे आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। ऐसे में राणा साहब को मिले आरक्षण पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है, क्योंकि उनके खिलाफ की गई शिकायत में साफ लिखा है कि वे, यानी राणा जी, उत्तरप्रदेश के मूल निवासी हैं।
यह शिकायत सच है, इस बात की तस्दीक उनके परिजनों से भी होती है, क्योंकि उनके सगे चाचा आत्माराम भड़सइयां अभी भी उत्तरप्रदेश के मऊरानीपुर में ही रहते हैं। ऐसे ही उनके दोनों बड़े भाई मानिकचंद और खूबचंद भड़सइयां भी वहीं, यानी मऊरानीपुर में ही रहते हैं।
ऐसे में यदि राणा जी के चाचा या दोनों भाइयों ने उत्तरप्रदेश सरकार से किसी भी तरह का अनुसूचित जाति का सर्टिफिकेट होने का लाभ लिया है, तो सारे मामले का अपने आप पटाक्षेप हो जाता है। मतलब साफ है कि या तो उनके चाचा और दोनों भाई गलत हैं, या फिर प्रमुख अभियंता केपीएस राणा।
हालांकि राणा जी के एक भाई महाराष्ट्र में चिकित्सक रहे हैं, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि भाई साहब ने भी आरक्षण का लाभ लिया था या नहीं। जाहिर है, अगर उन्होंने भी लिया होगा, तो वह भी गलत था।
खैर, राणा साहब के मूल निवास प्रमाणपत्र की गहराई से जांच हो गई, तो वे मुश्किल में पड़ सकते हैं, क्योंकि पीडब्ल्यूडी विभाग के ही विलाश भूगांवकर प्रकरण आज भी पीडब्ल्यूडी विभाग के लोगों के जहन में है। जिसमें भूगांवकर ने मध्यप्रदेश में आरक्षण का लाभ लिया था, मगर वे थे दूसरे राज्य के। ऐसे में जब उनके खिलाफ की गई शिकायत सही पाई गई, तो उन्हें नौकरी से ही बर्खास्त कर दिया गया और वे सालों बर्खास्त रहे।
जिस पर बाद में सुप्रीम कोर्ट ने मर्सी ग्राउंड पर उन्हें पुनः सेवा में रखने का आदेश तो दिया, मगर जिस पद में वे भर्ती हुए थे, उसी पद पर, यानी सहायक यंत्री के पद पर ही। अर्थात उनके साथ “पुनः मूषको भव” वाली कहावत चरितार्थ हो गई।
बेचारे भूगांवकर जिस पद पर भर्ती हुए थे, उसी पद पर रिटायर भी हुए, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने उनके सारे प्रमोशन निरस्त कर दिए थे।
अब चर्चा एक बार फिर राणा साहब की। तो केपीएस राणा विभाग के सर्वोच्च पद पर विराजमान हैं। अंत में स्वराज एक्सप्रेस माननीय राणा जी से अनुरोध करता है कि इस मुद्दे का पटाक्षेप करने के लिए वे खुद आगे आएं और सच्चाई से विभाग को अवगत कराएं, क्योंकि आप जिस पद पर विराजमान हैं, वह अत्यंत ही गरिमामय पद है।
और आम तौर पर सूक्त वाक्य के रूप में यह कहा भी जाता है — लोक निर्माण, यानी राष्ट्र निर्माण।
फिलहाल इतना ही, आगे की सच्चाई से भी हम आपको जल्द ही अवगत कराएंगे।
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