Wednesday, 22 July 2026
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धर्म-आस्था

214 फीट ऊंचे शिखर पर हर शाम जलता है महादीप, सदियों से चली आ रही है यह अद्भुत परंपरा

पुरी। ओडिशा के श्री जगन्नाथ मंदिर में हर दिन एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जो आस्था, साहस और समर्पण का अद्भुत संगम मानी जाती है। मंदिर के 214 फीट ऊंचे शिखर पर सेवायत पुजारी प्रतिदिन चढ़कर ध्वज परिवर्तन करते हैं और सूर्यास्त के समय महादीप (संध्या दीप) प्रज्वलित करते हैं। यह परंपरा सदियों से बिना रुके आज भी उसी श्रद्धा और नियमों के साथ निभाई जा रही है।

214 फीट ऊंचे शिखर तक पहुंचना आसान नहीं

श्री जगन्नाथ मंदिर का शिखर लगभग 214 फीट ऊंचा है। इतनी ऊंचाई तक पहुंचना किसी भी व्यक्ति के लिए आसान नहीं होता, लेकिन प्रशिक्षित सेवायत पुजारी प्रतिदिन इस कठिन सेवा को निभाते हैं। यह केवल शारीरिक क्षमता का ही नहीं, बल्कि गहरी आस्था और वर्षों के अभ्यास का भी प्रमाण माना जाता है।

रोज बदला जाता है मंदिर का ध्वज

मंदिर की प्रमुख परंपराओं में से एक ध्वज परिवर्तन है। हर दिन भगवान जगन्नाथ के मंदिर पर नया ध्वज चढ़ाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि मंदिर का ध्वज प्रतिदिन बदलना आवश्यक है और यह भगवान की सेवा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। मौसम कैसा भी हो, यह परंपरा कभी नहीं रुकती।

सूर्यास्त के समय जलाया जाता है महादीप

ध्वज परिवर्तन के बाद सूर्यास्त के समय मंदिर के शिखर पर महादीप या संध्या दीप प्रज्वलित किया जाता है। यह दीप भगवान जगन्नाथ और माता महालक्ष्मी के प्रति श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि महादीप का प्रकाश पूरे क्षेत्र में सुख-समृद्धि और मंगल का संदेश लेकर आता है।

पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाई जा रही है सेवा

यह सेवा सामान्य पुजारी नहीं करते। इसके लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित सेवायत पुजारियों को चुना जाता है। वर्षों तक प्रशिक्षण और अनुभव प्राप्त करने के बाद ही उन्हें मंदिर के शिखर पर चढ़ने की जिम्मेदारी दी जाती है। यह परंपरा सेवायत परिवारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है।

आस्था के साथ जुड़ी है माता महालक्ष्मी की मान्यता

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मंदिर में ध्वज परिवर्तन और महादीप प्रज्ज्वलन केवल भगवान जगन्नाथ की सेवा ही नहीं, बल्कि माता महालक्ष्मी के प्रति समर्पण का भी प्रतीक है। कहा जाता है कि मंदिर की सभी धार्मिक परंपराएं माता महालक्ष्मी की कृपा और अनुमति से ही संपन्न मानी जाती हैं।

लाखों श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र

देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालु इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए पुरी पहुंचते हैं। मंदिर के शिखर पर सेवायत पुजारी को चढ़ते देख श्रद्धालु इसे भगवान जगन्नाथ की विशेष कृपा और सनातन परंपरा का जीवंत स्वरूप मानते हैं।

आज भी जीवित है सदियों पुरानी विरासत

आधुनिक तकनीक और बदलते समय के बावजूद श्री जगन्नाथ मंदिर की यह परंपरा बिना किसी बदलाव के आज भी जारी है। यही कारण है कि यह अनुष्ठान केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सनातन आस्था और प्राचीन विरासत का जीवंत प्रतीक माना जाता है।

 
 
 
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