नई दिल्ली: हवाई यात्रा के दौरान यात्रियों की सुरक्षा सबसे ऊपर है और इसमें एक छोटी सी चूक या लापरवाही की कोई जगह नहीं है। दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने एक हालिया फैसले में इसी बात पर मुहर लगाई है। कोर्ट ने उड़ान से पहले शराब जांच (ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट) में विफल रहने वाले एक पायलट के लाइसेंस निलंबन को सही ठहराते हुए उसे राहत देने से इनकार कर दिया है।
0.004% अल्कोहल और 3 महीने का सस्पेंशन
यह मामला नवंबर 2017 का है, जब कोलकाता से दिल्ली की उड़ान भरने से पहले एक पायलट का अनिवार्य ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट किया गया था। इस जांच में पायलट के शरीर में 0.004 प्रतिशत अल्कोहल की मात्रा पाई गई।
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दो बार जांच: पहली बार पॉजिटिव आने के बाद दोबारा टेस्ट किया गया, लेकिन परिणाम वही रहा।
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कार्रवाई: एयरलाइन ने नियमों का पालन करते हुए तुरंत पायलट को ड्यूटी से हटाया और डीजीसीए (DGCA) के दिशा-निर्देशों के तहत उसका लाइसेंस तीन महीने के लिए निलंबित कर दिया।
पायलट की दलील: "मशीन खराब हो सकती है"
पायलट ने इस कार्रवाई को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। उसके वकील ने कोर्ट में कई तर्क पेश किए:
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निजी लैब की रिपोर्ट: घटना के कुछ समय बाद ही निजी लैब में कराए गए ब्लड और यूरिन टेस्ट की रिपोर्ट 'नेगेटिव' थी।
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मशीन की सटीकता: पायलट का दावा था कि ब्रेथ एनालाइजर मशीन त्रुटिपूर्ण हो सकती है और तकनीकी खराबी के कारण 'फॉल्स पॉजिटिव' परिणाम दे सकती है।
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मेडिकल मानक: यह भी तर्क दिया गया कि अगर रिपोर्ट पॉजिटिव आती है, तो तत्काल मेडिकल जांच (खून/यूरिन टेस्ट) की वैकल्पिक व्यवस्था होनी चाहिए।
कोर्ट का सख्त फैसला: "सुरक्षा सर्वोपरि"
जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की बेंच ने सिंगल जज के पुराने फैसले को बरकरार रखा। कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां इस प्रकार रहीं:
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बाद की जांच बेअसर: कोर्ट ने साफ कहा कि एयरपोर्ट पर सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तत्काल किया गया ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट ही मान्य होगा। उसके घंटों बाद कराई गई निजी जांच को आधार नहीं बनाया जा सकता।
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तकनीकी पहलू: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यूरिन या ब्लड टेस्ट को मानक बनाने जैसा तकनीकी निर्णय लेना कोर्ट का काम नहीं है, यह विमानन प्राधिकरणों (Authorities) का अधिकार क्षेत्र है।
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सख्त संदेश: कोर्ट ने माना कि सुरक्षा मानकों से किसी भी तरह का समझौता स्वीकार्य नहीं है।
विमानन जगत के लिए बड़ा संदेश
दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला एयरलाइंस और पायलटों के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है। डीजीसीए के 'जीरो टॉलरेंस' नियम के तहत, उड़ान से पहले शराब का हल्का सा अंश भी करियर के लिए भारी पड़ सकता है। यह फैसला विमानन सुरक्षा के प्रति न्यायिक सख्ती को भी दर्शाता है।
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