Monday, 01 June 2026
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चूहे खा गए रिश्वत के पैसे: सुप्रीम कोर्ट में 'अजीबोगरीब' दलील, दोषी महिला को मिली जमानत

अदालतों में अक्सर हैरान करने वाले मामले सामने आते हैं, लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक ऐसा मामला आया जिसने जजों को भी सोच में डाल दिया। बिहार के एक भ्रष्टाचार मामले में यह दलील दी गई कि रिश्वत के तौर पर जब्त किए गए नोटों को चूहों ने कुतर डाला है। इस दलील के बाद शीर्ष अदालत ने दोषी महिला अधिकारी को जमानत दे दी है।


क्या है पूरा मामला?

यह मामला बिहार की एक महिला अधिकारी अरुणा कुमारी से जुड़ा है, जो चाइल्ड डेवलपमेंट प्रोग्राम ऑफिसर (CDPO) के पद पर तैनात थीं।

  • आरोप: अरुणा कुमारी पर 10 हजार रुपये की रिश्वत मांगने का आरोप था।

  • सजा: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत उन्हें दोषी पाया गया था और पटना उच्च न्यायालय ने उनकी सजा बरकरार रखी थी।

जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो राज्य पुलिस की एक बड़ी लापरवाही उजागर हुई। पुलिस ने बताया कि रिश्वत के रूप में जब्त किए गए नोटों को मालखाने में रखा गया था, लेकिन कोर्ट में पेश करने से पहले ही चूहों ने उन्हें नष्ट कर दिया।


सुप्रीम कोर्ट की कड़ी नाराजगी

न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की। कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां निम्नलिखित रहीं:

  • साक्ष्यों की सुरक्षा: पीठ ने सवाल उठाया कि पुलिस कस्टडी में रखे गए महत्वपूर्ण साक्ष्य सुरक्षित क्यों नहीं थे?

  • व्यवस्था पर सवाल: अदालत ने कहा कि साक्ष्यों का इस तरह गायब होना कानून व्यवस्था और राज्य के राजस्व के लिए एक बड़ा नुकसान है।

  • पुराना बहाना: कोर्ट ने तंज कसते हुए कहा कि यह कोई पहला मामला नहीं है; पहले भी नशीले पदार्थों और नकदी के मामले में 'चूहों' का बहाना बनाया जाता रहा है, जो व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है।


अदालत का फैसला

महिला के वकील ने तर्क दिया कि जब मुख्य साक्ष्य (रिश्वत के नोट) ही मौजूद नहीं हैं, तो अपील लंबित रहने के दौरान सजा को बरकरार रखना उचित नहीं है।

  • जमानत मंजूर: तथ्यों और साक्ष्यों के अभाव को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अरुणा कुमारी की सजा को फिलहाल स्थगित कर दिया और उन्हें जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया।

  • अंतिम सुनवाई तक राहत: शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक मामले की अंतिम सुनवाई पूरी नहीं हो जाती, तब तक दोषी को जेल में रखना आवश्यक नहीं है।

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