sp tripathi :
न हि लोभसमो दोषो न लोभसमो रिपुः।
लोभाद् विनश्यते वित्तं, लोभाद् विनश्यते यशः॥”
अर्थात् लोभ से बड़ा कोई दोष नहीं और लोभ से बड़ा कोई शत्रु नहीं, क्योंकि लोभ के कारण धन भी नष्ट होता है और प्रतिष्ठा भी। लेकिन जब यही लोभ शासन और प्रशासन की चौखट तक पहुंच जाए, तो सवाल केवल धन के नष्ट होने का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर खड़ा हो जाता है।
आज हम महज एक खबर नहीं दे रहे हैं, बल्कि जनजातीय विभाग के मंत्री और प्रशासन के मुखिया यानी प्रदेश के मुख्य सचिव के नाम एक अनुरोध-पत्र जारी कर रहे हैं कि आपके नाक के नीचे जनजातीय विभाग में करीब 150 करोड़ रुपये के कथित भ्रष्टाचार का मामला सामने आता है और आप दोनों महानुभाव इस पर कार्रवाई करने के बजाय मौनव्रत धारण कर लेते हैं। जबकि इस पूरे मामले में ई.ओ.डब्ल्यू. (EOW) ने न केवल शिकायत दर्ज की है, बल्कि जनजातीय विभाग से जवाब-तलब भी किया है। मगर विभाग के कमिश्नर तरुण राठी ने ई.ओ.डब्ल्यू. द्वारा दिए गए समन पर मानो कुंडली मारकर बैठने का रास्ता अख्तियार कर लिया। ई.ओ.डब्ल्यू. ने जनजातीय विभाग से 8 बिंदुओं पर जानकारी मांगी, लेकिन बिंदुवार जानकारी देना तो दूर, विभाग की ओर से उस पत्र के जवाब में एक साधारण पत्र तक नहीं भेजा गया। काबिलेगौर यह है कि ई.ओ.डब्ल्यू. ने विभाग को एक के बाद एक 8 समन जारी किए, लेकिन नतीजा सिफर रहा। ई.ओ.डब्ल्यू. ने पहला समन यानी पत्र 25 मार्च 2026 को जारी किया और आखिरी समन 24 जून 2026 को जारी हुआ। इसके बाद ई.ओ.डब्ल्यू. ने भी चुप्पी साध ली। आखिर ई.ओ.डब्ल्यू. ने कोई कार्रवाई करने के बजाय इस शिकायत को ठंडे बस्ते में क्यों डाल दिया, यह तो अंदरखाने की खबर है, मगर स्वराज एक्सप्रेस को जो जानकारी मिली है, उसके मुताबिक इस मामले में जुलाई में अचानक एकशर्मा नाम के राजनीतिक पावर ब्रोकर की एंट्री होती है और इसके बाद पूरी जांच टांय-टांय फिस्स हो जाती है। ये शर्मा जी कौन हैं? तो इतना इशारा काफी है कि कभी ये एक साधारण शिक्षक हुआ करते थे और आज प्रदेश के बड़े व्यवसायियों में इनकी गिनती होती है। खैर, अब जरा नजर डालते हैं कि आखिर यह घपला खुला कैसे?
मामला तब शुरू होता है, जब विभाग द्वारा यह प्रस्ताव तैयार किया गया कि जनजातीय कार्य विभाग द्वारा संचालित 24,196 आदिवासी बच्चों के स्कूलों में स्मार्ट क्लास बनाई जानी है। इसके लिए इंटरैक्टिव पैनल, यानी क्लासरूम में लगने वाली एल.ई.डी. स्क्रीन की सप्लाई करने वाली तमाम कंपनियां टेंडर हासिल करने के लिए सक्रिय हो गईं। लेकिन यहां खेल कुछ और ही था। आरोप है कि विभाग के सर्वेसर्वा पहले से ही यह तय कर चुके थे कि टेंडर किस कंपनी को देना है। इसलिए टेंडर प्रक्रिया में भाग लेने के लिए ऐसी नियम-शर्तें तैयार की गईं, ताकि कुछ खास कंपनियां ही इसमें भाग ले सकें। इसी तारतम्य में 10 फरवरी 2026 को टेंडर जारी कर दिया गया।
इसके खिलाफ जनजातीय विभाग के प्रमुख सचिव गुलशन बबरा को शिकायत की गई। प्रमुख सचिव ने उस शिकायत-पत्र को अपर सचिव नेहा मारविया को मार्क कर दिया। अपर सचिव नेहा मारविया ने भी शिकायत को गंभीरता से लिया और जांच के लिए तीन सदस्यीय जांच समिति गठित कर दी, जिसमें स्वयं नेहा मारविया भी शामिल रहीं। तत्पश्चात समिति द्वारा जो जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, उसमें स्पष्ट निर्देश दिए गए कि टेंडर प्रक्रिया गलत है, इसलिए इसे निरस्त किया जाए।
लेकिन हुआ इसके ठीक उलट। यहां तो “चट मंगनी, पट ब्याह” वाली कहावत चरितार्थ होती दिखाई दी। विभाग ने कथित तौर पर चहेती कंपनी को टेंडर भी जारी कर दिया और फटाफट भुगतान भी कर दिया। यह सब मध्यप्रदेश भंडार गृह नियम तथा सेवा खरीद नियमों के उल्लंघन के आरोपों के बीच हुआ।
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि स्मार्ट क्लास के लिए जो इलेक्ट्रॉनिक उपकरण खरीदे गए, उनमें एक पैनल का कोटेशन 10 लाख 98 हजार रुपये बताया गया, जबकि खुले बाजार में उसी पैनल की कीमत लगभग 4 लाख रुपये के आसपास बताई जा रही है। अब जरा सोचिए, जब ऐसे 24,196 स्कूल हैं और प्रत्येक नग की खरीद में इतनी बड़ी राशि का अंतर सामने आता है, तो कुल अंतर कितना होगा? इसी आधार पर इस पूरे मामले में 100 करोड़ रुपये से भी अधिक के कथित घोटाले के आरोप लगाए जा रहे हैं। और दूसरी तरफ जून के बाद से न कोई जांच आगे बढ़ती दिखाई दी और न ही ई.ओ.डब्ल्यू. की कोई कार्रवाई सामने आई।
ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर पावर ब्रोकर शर्मा जी ने कौन सा समीकरण बिठाया होगा, जिसके बाद जांच की रफ्तार पर अचानक ब्रेक लग गया? आखिर 8-8 समन के बावजूद विभाग की ओर से जवाब क्यों नहीं दिया गया? जांच समिति की रिपोर्ट में टेंडर प्रक्रिया को गलत बताते हुए उसे निरस्त करने के निर्देश दिए गए, तो फिर उसी प्रक्रिया के तहत टेंडर कैसे जारी हो गया और भुगतान तक कैसे पहुंच गया? इन सवालों के जवाब आखिर कौन देगा?
उधर, टेंडर प्रक्रिया में भी एक राजनीतिक पावर ब्रोकर की महत्वपूर्ण भूमिका होने की बात सामने आ रही है, जिन्हें “धाकड़” नाम से जाना जाता है। अब सवाल यह है कि इस पूरे मामले में सत्ता, प्रशासन, टेंडर और कथित पावर ब्रोकरों के बीच आखिर कौन-सा समीकरण काम कर रहा था?
“दाल में कुछ काला है” कहावत यूं ही नहीं बनी होगी। जब जांच एजेंसी बार-बार जानकारी मांगती है, आठ समन जारी होते हैं, विभागीय स्तर पर जांच समिति टेंडर प्रक्रिया को गलत बताती है, फिर भी टेंडर जारी हो जाता है और भुगतान भी कर दिया जाता है, तो स्वाभाविक रूप से कई गंभीर सवाल जन्म लेते हैं।
इसीलिए स्वराज एक्सप्रेस एक बार फिर प्रदेश के प्रशासनिक मुखिया यानी मुख्य सचिव और जनजातीय विभाग के मंत्री से अविलंब कार्रवाई की मांग कर रहा है। सवाल केवल करीब 150 करोड़ रुपये के कथित भ्रष्टाचार का नहीं है, सवाल यह भी है कि जब शिकायत, जांच, समन और विभागीय रिपोर्ट सब कुछ सामने मौजूद है, तो फिर कार्रवाई की फाइल आखिर किस चौखट पर जाकर अटक गई? प्रदेश की जनता यह जानना चाहती है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कब होगी और कथित अनियमितताओं के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई कब होगी?
क्योंकि जब व्यवस्था की आंखों के सामने सवाल खड़े हों और फिर भी मौन छाया रहे, तो जनता के मन में यही प्रश्न उठता है—आखिर इस मौन के पीछे मजबूरी है, मिलीभगत है या फिर कोई ऐसा समीकरण, जिसकी जानकारी अभी पर्दे के पीछे है?
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