Monday, 01 June 2026
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मध्य प्रदेश

फर्जी कागजों के जरिए लिए जा रहे टेंडर, आखिर कब होगी जांच?

PWD टेंडर घोटाला छतरपुर: आज हम आपको ऐसी खबर दे रहे हैं जो आपको अचंभित कर देगी कि पीडब्ल्यूडी विभाग में ऐसे भी गुल खिलाए जाते हैं।

हालांकि, पीडब्ल्यूडी विभाग उन विभागों में से एक है, जहां कमीशनखोरी का राज आज से नहीं, सालों-साल से चलता आ रहा है। लेकिन यह खबर लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह को भी कटघरे में खड़ा कर रही है, क्योंकि मंत्री तो आप हैं, विभाग सही और साफ-सुथरा चले, इसकी जिम्मेदारी भी आपकी है।

मगर जब खुलआम भ्रष्टाचार का खेल खेला जाएगा, तो दाग मंत्री पर भी लगना स्वाभाविक है।

जी हां, ताजा मामला स्वराज एक्सप्रेस के पास छतरपुर से आया है, जहां सारे नियम-कायदों को ताक पर रखकर चहेते ठेकेदारों को करोड़ों के ठेके दिए जा रहे हैं। मामला छतरपुर का है, पर उसकी डोर भोपाल से जुड़ी है। वो कैसे? तो आपको बताते हैं।

दरअसल, पीडब्ल्यूडी के प्रमुख अभियंता के.पी.एस. राना टीकमगढ़ जिले के पेतपुरा गांव के रहने वाले हैं, और उनके गांव से सटा है मऊरानीपुर, जहां के रहने वाले हैं प्रदीप राय, जिनकी कंपनी का नाम है गिर्राज कंस्ट्रक्शन।

तो राय साहब का गृह निवास और प्रमुख अभियंता राणा का गृह निवास अगल-बगल है। ऐसे में राणा साहब पड़ोसी धर्म निभाने में इतना मशगूल हुए कि सारे नियम-कायदों को ताक पर रखकर प्रदीप राय की कंपनी गिर्राज कंस्ट्रक्शन को ही ठेका दिलवा रहे हैं।

हालांकि, गिर्राज कंस्ट्रक्शन को टेंडर रिलीज करने वाले हैं छतरपुर में पदस्थ भारती और सागर में पदस्थ मुख्य अभियंता सी.पी. सिंह, लेकिन परदे के पीछे से सारा खेल कर रहे हैं प्रमुख अभियंता के.पी.एस. राना।

अब जानिए कि गिर्राज कंस्ट्रक्शन को टेंडर कैसे दिया जा रहा है।

तो पहले टेंडर प्रक्रिया में भाग लेने वाली दूसरी कंपनियों को तकनीकी कमियां बताकर या फिर कागजों में त्रुटि दिखाकर रिजेक्ट किया जाता है। उसके बाद गिर्राज कंस्ट्रक्शन कंपनी को सभी मापदंडों में सही बताते हुए टेंडर जारी कर दिया जाता है, भले ही गिर्राज कंपनी के कागजों में कितनी भी त्रुटि हो।

इस तरह पिछले छह से सात महीने में 25 करोड़ से भी ज्यादा के ठेके गिर्राज कंस्ट्रक्शन कंपनी को दिए जा चुके हैं।

हद तो तब हो गई, जब गिर्राज कंपनी की अन्य कंपनियों ने मय सबूत के प्रमुख अभियंता के.पी.एस. राना को शिकायत की, तो भी गिर्राज इन्फ्रास्ट्रक्चर को टेंडर जारी करने का सिलसिला नहीं रुका।

दरअसल, लोक निर्माण विभाग द्वारा छतरपुर के मेन रोड से ग्राम रजपुरा और गुलगंज मेन रोड से पाथापुर के लिए पांच करोड़ 27 लाख की राशि का टेंडर निकाला गया, जिसकी टेंडर आईडी-2025-PWDRB-4516-1 है।

इस टेंडर प्रक्रिया में भाग लेने के लिए कंपनी के पास खुद की जेसीबी, टेंडम रोलर और मोटर ग्रेडर होना अनिवार्य रखा गया।

अब गिर्राज इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनी के पास टेंडम रोलर और मोटर ग्रेडर था ही नहीं, मगर यहां “सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का” वाली कहावत चरितार्थ हुई।

यानि, जब प्रमुख अभियंता की उन पर कृपा है, तो उन्होंने टेंडम रोलर और मोटर ग्रेडर के कंपनी द्वारा खरीदे जाने का फर्जी बिल बना लिया और उसे टेंडर प्रक्रिया में ऑनलाइन अपलोड भी कर दिया।

कहा जाता है कि जब कोई अपराधी अपराध करता है, तो कोई न कोई सुराग जरूर छोड़ देता है। वही गिर्राज कंपनी के साथ हुआ।

उन्होंने रियान इन्फ्रासेल्यूशन से टेंडम रोलर खरीदे जाने के सारे फर्जी बिल बना लिए, मगर गलती यह कर गए कि उन्होंने खरीदी में लगने वाली जीएसटी 28 प्रतिशत दिखा दी, जबकि टेंडम रोलर में जीएसटी 18 प्रतिशत ही लगती है।

नतीजा, टेंडर प्रक्रिया में अपात्र कर दी गई कंपनियों के संचालकों के कान खड़े हो गए।

वे बिल का इनवॉइस नंबर लेकर सीधे रियान इन्फ्रासेल्यूशन के संचालक के पास पहुंच गए, तो सारा मामला अपने आप खुल गया।

कंपनी के संचालक ने साफ लिखकर दे दिया कि उनकी दोनों कंपनियों—रियान इन्फ्रासेल्यूशन और डायना पैक इंडिया प्राइवेट लिमिटेड—ने गिर्राज इन्फ्रास्ट्रक्चर को कोई टेंडम रोलर नहीं बेचा है, और साथ ही बिल में दर्शाया गया इनवॉइस नंबर 112517 भी फर्जी है।

ऐसे में, जब टेंडम रोलर के बिल फर्जी पाए गए, तो अन्य कागजों की छानबीन की गई। तब पता चला कि मोटर ग्रेडर के कागजों में भी यही कारस्तानी की गई थी।

मोटर ग्रेडर का निविदा में जो आरटीओ रजिस्ट्रेशन नंबर अपलोड किया गया, वह MP 16DA0382 है, लेकिन आरटीओ कार्यालय में इस रजिस्ट्रेशन नंबर पर मिनी ग्रेडर BS-III दर्ज है।

और तो और, खुद गिर्राज कंपनी के इनवॉइस में भी मॉडल नंबर S-3218 मिनी ग्रेडर दर्ज है, जबकि शर्त के मुताबिक मोटर ग्रेडर होना चाहिए।

मजे की बात तो यह है कि गिर्राज कंपनी द्वारा टेंडर हासिल करने के लिए कूट-रचित फर्जी दस्तावेज लगाए गए हैं। इसकी समस्त जानकारी मय सबूत के प्रमुख अभियंता के.पी.एस. राना को लिखित में दे दी गई, उसके बावजूद गिर्राज कंपनी को टेंडर स्वीकृत कर दिया गया।

जबकि विभाग और प्रशासन को फर्जी दस्तावेजों के जरिए गुमराह करने के मामले में गिर्राज इन्फ्रास्ट्रक्चर को हमेशा के लिए ब्लैकलिस्ट कर देना चाहिए था।

हां, टेंडर प्रक्रिया से अपात्र उनको घोषित किया गया, जिन्होंने गिर्राज कंस्ट्रक्शन के फर्जी दस्तावेजों की प्रति के.पी.एस. राना, यानी विभाग के समक्ष प्रस्तुत की थी।

अब आप खुद ही समझ गए होंगे कि पीडब्ल्यूडी में किस तरह का खेल—नहीं, अंधेरगर्दी—चल रही है।


 
 
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