Bhopal desk। सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त उन विरली विभूतियों में एक हैं जिन्होंने एक साथ तीन दिशाओं में संघर्ष किया था। नागरिक अधिकारों और नागरिक सम्मान के लिये, दूसरा समाज की आर्थिक उन्नति के लिये और तीसरा देश को अंग्रेजों से मुक्ति के लिये भी। उन्हें जेल में इतनी प्रताड़ना दी गई कि रांची जेल में उनका बलिदान हो गया।
यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त का जन्म 22 फ़रवरी 1885 को चटगांव में हुआ था। यह क्षेत्र अब बांग्लादेश में है। उनके पिता जात्रमोहन सेनगुप्त समाज में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे तथा बंगाल विधान परिषद के सदस्य भी थे। परिवार में आधुनिक शिक्षा का वातावरण था। यतीन्द्र मोहन अपनी आरंभिक शिक्षा पूरी करके 1904 में वकालत करने इंग्लैंड गए और 1909 में वकील बनकर भारत लौटे।
इंग्लैंड में रहते हुए उनकी निकटता एक यूरोपीय सहपाठी नेल्ली ग्रे से हुई। यह दोस्ती प्यार में बदली और दोनों ने विवाह कर लिया। वे नेल्ली से विवाह करके ही भारत लौटे। बंगाल में परिवार एक प्रतिष्ठित परिवार था, अतः यहां उन्हें अंग्रेजों द्वारा भारतीयों के साथ किए जाने वाले असम्मानजनक व्यवहार का उतना अनुभव नहीं था जितना लंदन में पढ़ाई के दौरान हुआ। उनके मन में समानता के व्यवहार और समान नागरिक अधिकारों के लिये संकल्प बना। भारत लौटकर यतीन्द्र मोहन इसी काम में लगे। उनका साथ उनकी यूरोपीय पत्नी नेल्ली ने भी दिया और वे भी इसी अभियान में लग गईं।
भारत लौटकर यतीन्द्र मोहन ने अपना आरंभिक व्यवसायिक जीवन कोलकाता उच्च न्यायालय में वकालत और रिपन लॉ कॉलेज में अध्यापक के रूप में आरम्भ किया। वे अदालत में भी समान सम्मान करने का अभियान चलाते और अपने लॉ कॉलेज में भी। अपने इसी अभियान को बल देने के लिये वे 1911 में कांग्रेस के सदस्य बने। कांग्रेस में सम्पर्क और सक्रियता दोनों बढ़ीं। वे अपने समय के सुप्रसिद्ध वकील मोतीलाल नेहरू के भी संपर्क में आए।
1920 में उन्होंने कांग्रेस में सक्रियता के साथ किसानों और मज़दूरों को संगठित करने का काम आरम्भ किया। उन्होंने अपने इस नये संकल्प के अंतर्गत सिलहट में चाय बागानों के श्रमिकों के शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई। श्रमिकों को संगठित किया और चाय बागान में हड़ताल हो गई। इसका प्रभाव रेलवे और पानी के जहाजों में काम करने वाले श्रमिकों पर भी पड़ा और वहां भी हड़ताल हो गई। इससे रुष्ट होकर अंग्रेज सरकार ने 1921 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
पंडित मोतीलाल नेहरू ने स्वराज पार्टी का गठन किया तो यतीन्द्र मोहन उसके सदस्य बने और इसी पार्टी की ओर से बंगाल विधान परिषद के सदस्य चुने गए। 1925 में वे कोलकाता के मेयर बने। अपनी निरंतर सक्रियता से वे इतने लोकप्रिय हुए कि लगातार पांच बार कोलकाता के मेयर बने। पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुए 1928 के कोलकाता अधिवेशन के स्वागताध्यक्ष भी यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त ही थे।
अंग्रेज सरकार ने जब रंगून और बर्मा को भारत से अलग करने का निर्णय लिया तो इसका विरोध करने के लिये सबसे पहले यतीन्द्र मोहन ही सामने आए। उनका साथ उनकी पत्नी नेल्ली ने दिया। तब दोनों पति-पत्नी को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। 1930 में यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त को कांग्रेस ने अपना कार्यवाहक अध्यक्ष घोषित किया। रिहाई के बाद 1931 में उनका नाम कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिये आया, किन्तु उन्होंने सरदार वल्लभभाई पटेल के पक्ष में अपना नाम वापस ले लिया। कांग्रेस का अधिवेशन करांची में हुआ था। जेल से जब बाहर आए तब उनका स्वास्थ्य भी बहुत गिर चुका था। अधिवेशन के बाद वे उपचार के लिये विदेश गए। 1932 में स्वदेश लौटते ही पुनः गिरफ्तार कर लिये गए। इस बार नेल्ली गिरफ्तार नहीं की गई थीं।
1933 में कोलकाता में हुए कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता नेल्ली सेनगुप्त ने ही की। इस अधिवेशन की अध्यक्षता महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी को करनी थी, पर अंग्रेज सरकार ने अधिवेशन पर रोक लगा दी थी और मालवीय जी को मार्ग में ही गिरफ्तार कर लिया गया था। यतीन्द्र मोहन पहले से ही जेल में थे, इसलिए इस अधिवेशन की अध्यक्षता श्रीमती नेल्ली सेनगुप्त ने की। किन्तु उन्हें भी अधिवेशन स्थल से ही गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया।
यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त पूरी तरह स्वस्थ नहीं थे, फिर भी सामाजिक जागरण में सक्रिय हो गए थे। अंग्रेज सरकार की उनसे नाराज़गी बढ़ती जा रही थी। इस बार बंदी बनाकर उन्हें अनेक प्रकार के प्रलोभन भी दिए गए और प्रताड़ित भी किया गया, जिससे उनका स्वास्थ्य और गिर गया। उन्हें जेल में क्रूरतम प्रताड़ना दी गई। वे बंगाल प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी रहे तथा सविनय अवज्ञा आन्दोलन में उन्होंने सक्रिय नेतृत्व किया। उन्हें पूना, दार्जिलिंग और राँची में कैद रखा गया।
विभिन्न जेलों में दी गई प्रताड़ना से अंततः 22 जुलाई 1933 को उनका बलिदान हुआ। उस समय वे केवल 48 वर्ष के थे। उन्होंने जीवनभर सामाजिक जागरण, नागरिक अधिकारों की समानता और स्वाधीनता के लिये संघर्ष किया। वे 'देशप्रिय' उपनाम से विख्यात हुए।
उनके निधन के बाद उनकी पत्नी नेल्ली सेनगुप्त ने उनके कार्यों को आगे बढ़ाया और अपना शेष जीवन समाज सुधार एवं नागरिक अधिकारों की रक्षा के संघर्ष में समर्पित कर दिया।
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